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After months of practicing, you have finally boosted your typing speed above that of a snail. You have finally got the hang of not looking at the keyboard for each character. You are no longer “hunting and pecking” to find the keys you need. Good, these are important steps in your journey towards becoming a computer master. However, there is much more to learn, and I am here to show you a way to speed up your typing efficiency by a huge margin.




श्रावण महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नागपंचमी का पर्व मनाया जाता है। हिंदू धर्म के लोग इस दिन नाग को देवता मानकर उनकी पूजा करते हैं। इस बार यह पर्व 23 जुलाई, सोमवार को है। सोमवार चूंकि भगवान शिव का दिन माना गया है इसलिए इस बार नागपंचमी का महत्व और भी बढ़ गया है।
तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता ने आज हिंदुओं के तीर्थ चीन और नेपाल में Mukthinath मंदिर में मानसरोवर मंदिर में करने के लिए, क्रमशः सक्षम 40,000 रुपये और 10,000 रुपये की सब्सिडी की घोषणा की. राज्य विधानसभा में नियम 110 के तहत एक वक्तव्य बना रही है, उसने कहा सब्सिडी से राज्य के 500 तीर्थयात्रियों के लिए दिया होगा - मानसरोवर और Mukthinath मंदिरों के लिए 250 प्रत्येक विदेश मंत्रालय द्वारा चुना. उन्होंने कहा कि एक लाख रुपये की कुल लागत की, सरकार ने उन पर जाकर Mukthinath मंदिर, कुल लागत 25,000 रुपये आता है जिसके लिए के लिए सब्सिडी के रूप में मानसरोवर और 10,000 रुपये के लिए जा रहा तीर्थयात्रियों के लिए सब्सिडी के रूप में 40,000 रुपये देना होगा.![]() |
| Mahabharata |
For a better understanding let us look at history, back in 1970's computers were costly, huge in size often occupying large spaces and consumed a lot of power as a result they were out of reach to the general public but one man changed it all, when he created the first personal computer that had more computing power than thescientific computers used in the Apollo mission and occupied less space and consumed less power.. and that man unknown to the world then is known today allover asSteve Jobs, the man who created Mac O.S, I-POD, I-PAD,I-PHONE, Apple PC....
In 1990's two geek's go to Microsoft with their research project known as Internet Search Engine but are ridiculed and sent home.. but undeterred the two geeks's Larry Pageand Sergey Brin continued with their research and developed their own internet search engine known as "GOOGLE" and changed the way whole world looked atinternet. Through Google guys the real power of internet was noticed.
भारतीय राजनीति पर हमेशा से परिवारवाद और भाई-भतीजावाद के आरोप लगते रहे हैं। तर्क ये कि लोकतंत्र में परिवारवाद के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। मिसाल दी जाती है पश्चिमी देशों की। हालांकि इंग्लैंण्ड जैसा लोकतंत्र सदियों से एक शाही परिवार के अंगूठे के नीचे काम करता चला आ रहा है। अब इसे सही मानें या गलत, लेकिन भारतीय राजनीति में परिवारवाद कहीं न कहीं भारतीय समाज की मजबूत परिवार संस्था को ही दर्शाता है। जिन देशों में परिवार संस्थाएं बेहद कमजोर हैं वहां की राजनीति में भी परिवारवाद कम देखने को मिलता है। भारत समेत अधिकांश एशियाई देश भले ही लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत काम कर रहे हों, लेकिन वहां की राजनीति में परिवारों का खासा दखल है। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि इन देशों के समाज में परिवार आज भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। जबकि पश्चिमी देशों में परिवार संस्थाएं तेजी से भरभरा रही हैं।
देश के उत्तरी छोर से शुरू करते हुए अगर भारत पर नजर डालें तो- जम्मू कश्मीर की नेशनल काॅन्फ्रेंस में अब्दुल्ला परिवार और पीडीपी में मुफ्ती परिवार, उत्तर प्रदेश की सपा में मुलायम सिंह का परिवार और रालोद में चै. अजीत सिंह का परिवार, पंजाब के अकाली दल में बादल परिवार, हरियाणा के इनेलो में चैटाला परिवार, बिहार के राजद में लालू यादव परिवार, उड़ीसा के बीजद में पटनायक परिवार, महाराष्ट्र की शिव सेना में ठाकरे परिवार, तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार, ग्वालियर का सिंधिया परिवार और सबके ऊपर एक राष्ट्रीय परिवार- गांधी परिवार। भारत की राजनीति पूरी तरह परिवारों के गिरफ्त में है। भारतीय राजनीति में परिवार इतने महत्वपूर्ण हो चले हैं कि उनको राजनीति से अलग किया ही नहीं जा सकता। और जिस तरह जनता इन पारिवारिक पार्टियों के सिर पर जीत का सेहरा बांधती आ रही है, उसे देखकर तो यही लगता है कि आम जनमानस को परिवारवाद से कोई खास दिक्कत नहीं है।
वाम दल और भाजपा ऐसी पार्टियां हैं जहां पारिवारिक उत्तराधिकारी देखने को नहीं मिलते। भाजपा के वरिष्ठ नेता अपने बच्चों को सांसद और विधायक के पदों तक तो पहुंचाने में सफल रहे हैं, लेकिन किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के बेटे के सीएम-पीएम बनने के उदाहरण नहीं दिखते। भाजपा में संघ का दखल व अनुशासन और वाम दलों में पार्टी की सख्त कार्यप्रणाली व नीतियां इसके पीछे मुख्य कारण हो सकती है। लेकिन कांग्रेस समेत देश की बाकी पार्टियों में परिवारों का खासा बोलबाला है। वैसे भी ये तो इस देश की संस्कृति रही है कि पिता अपने पुत्र को और भाई अपने भाई को सदा से मजबूत बनाता चला आया है। तो अगर राजनीतिक दलों में ऐसा हो रहा है तो उसमें हैरान होने की कोई बात नहीं। भारत के जिन घरों में पिता-पुत्र और भाई-भाई के रिश्तों में दरारें हैं उन घरों को अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता। हमारे यहां खून के रिश्तों को इतना महत्व दिया जाता है कि सर्वोच्च पदों पर पहुंचने के बाद भी रिश्तों को दरकिनार नहीं कर सकते। जिस दिन भारतीय समाज में व्याप्त मजबूत परिवार संस्था कमजोर होगी उस दिन भारतीय राजनीति से भी परिवारवाद खत्म होना शुरू हो जाएगा।
इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकतंत्र के लिए परिवारवाद अच्छा नहीं, लेकिन आजादी के 65वें साल में भी लाख हो-हल्ले के बावजूद देश की राजनीति से परिवारवाद नहीं मिट पा रहा है। अगर केंद्रीय सरकार की बात करें तो 65 में से तकरीबन 50 सालों तक एक मात्र नेहरू-गांधी परिवार की बादशाहत रही है। उसी तरह जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला परिवार भी एकछत्र शासन करता चला आ रहा है। वैसे भारत में लोकतंत्र की स्थापना से पहले जो राजतांत्रिक व्यवस्था थी उसमें भी एक ही वंश लगातार शासन करता था। तो उस हिसाब से वर्तमान लोकतंत्र को उसी राजतांत्रिक व्यवस्था का सुधरा हुआ रूप भी कहा जा सकता है।